Property marks || संपत्ति चिह्न || Bns section 343 || bns in hindi

 BNS SECTION 343 

Property mark (संपत्ति चिह्न)

(1) ऐसा कोई भी चिह्न जो यह दिखता हो कि ये चल संपत्ति किसी विशेष व्यक्ति की है, इसे संपत्ति चिह्न कहा जाता है।

(2) अगर कोई व्यक्ति किसी चल संपत्ति, वस्तु, या पेटी, पैकेज, अथवा अन्य किसी पर कोई चिह्न लगाता है, या फिर ऐसा दिखाता है कि ये वस्तु उस व्यक्ति की है, जिस पर कोई चिह्न अंकित हो, और उसके ऐसा करने से किसी दूसरे व्यक्ति को ये यकीन हो जाता हैं कि ये वस्तु वास्तव में ही इसी व्यक्ति की है जबकि वह वस्तु वास्तव m उसकी है ही नहीं तो ऐसे में उसको मिथ्या संपत्ति चिह्न (False Property Mark) कहा जाता है।

(3) अगर कोई भी व्यक्ति ऐसी मिथ्या संपत्ति चिह्न का उपयोग करता है, जब तक कि वह उस वस्तु को सिद्ध न कर दे कि वह वस्तु वास्तव मे उसी व्यक्ति की है उसने ऐसा छल करने के आशय के बिना किया था, तो ऐसे व्यक्ति को एक वर्ष तक के कारावास या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

"कोई भी पति अपनी पत्नी की 'अश्लील चैटिंग' को बर्दाश्त नहीं करेगा: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक को बरकरार रखा || high court judgement 2025

 हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि शादी के बाद पति या पत्नी अगर किसी और इंसान से गलत तरीके से चैटिंग करती हैं, तो उस व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के खिलाफ यह मानसिक रूप से मानसिक अत्याचार माना जायगा। ऐसा करने पर हिंदू विवाह के अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक का कारण बन सकती है।


कोर्ट द्वारा की गई अहम बातें:


शादी में एक दूसरे का सम्मान करना ज़रूरी है – पति या पत्नी को अपने दोस्तों से बातचीत करने की आज़ादी होनी चाहिए, और यह भी बताया गया है कि ये बातचीत मर्यादा में होनी चाहिए।


ओर दोनों अपने जीवनसाथी की भावनाओं का ध्यान रखना ज़रूरी है – अगर पति या पत्नी को आपत्ति न हो और अगर फिर भी किसी से गलत तरह की बातें की जाएँ, तो इसे मानसिक रूप से क्रूरता कहा जाएगा। या अगर फिर भी किसी से गलत तरीके से बात की जाए, तो यह दिमागी क्रूरता मानी जाएगी।

सबूत – पत्नी के पिता, जो बड़े वकील थे, उन्होंने माना कि उनकी बेटी ने उसके किसी पुरुष दोस्तों से गलत चैट की है, जिससे कि उसके परिवार को उसकी वजह से बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी।


कोई विरोध नहीं किया गया – पत्नी ने यह कहा कि पति ने उसके खिलाफ झूठे सबूत बनाए हैं, जबकि उसने पुलिस में कोई शिकायत नहीं की। इसलिए कोर्ट ने पति की सारी बातों को सही माना।


फैसला पेंडिंग में रखा गया – हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को सही ठहराया और पत्नी की अपील को रद्द कर दिया।


फैसले का असर


शादी में भरोसा और इज्जत तोड़ना uमानसिक क्रूरता माना जा सकता है।

ऐसे में डिजिटल तरीके (जैसे चैटिंग) से किया गया गलत व्यवहार भी तलाक का कारण बन सकता है।

पति-पत्नी को आज़ादी है, लेकिन शादी की गरिमा और साथी की भावनाओं का सम्मान जरूरी है।


कोर्ट द्वारा दी गई राय:

कोर्ट को लगता है कि कोर्ट द्वारा लिया गया फैसला ठीक है। शादी में सबसे जरूरी है विश्वास और इज्जत। अगर कोई बार-बार अपने साथी की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है तो रिश्ता लंबे समय तक चल नहीं सकता। आज के समय में डिजिटल चैटिंग का असर भी असली दुनिया जितना ही है, इसलिए इसे हल्के में तो बिल्कुल भी नहीं लिया जाना चाहिए।

Rioting || दंगा || bns section 189 in Hindi || bns in Hindi

 Rioting (दंगा)

Bns section 189 में दंगा से संबंधित प्रावधान

(1) जब किसी व्यक्ति या किसी सदन द्वारा अवैध सभा का गठन होता है और उस सभा का मुख्य उद्देश्य बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता हैं तो उस सभा के सभी लोग दंगे के अपराधी माने जाएंगे


(2) जो कोई भी व्यक्ति दंगे मे शामिल मिलेगा उस व्यक्ति को 2 साल का कारावास या जुर्माना या फिर दिनों से भी दंडित किया जा सकता हैं 


(3) दंगे के दौरान अगर किसी व्यक्ति के पास घातक हथियार या कोई ऐसी वस्तु मिलती है जिससे कि दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाएगी ऐसे व्यक्ति को 5 साल का कठोर कारावास ,या जुर्माना या फिर दोनो से भी दंडित किया जा सकता है

Bns section 28 in hindi || सहमति भय या गलत धारणा के तहत दी गई हो || bns section 28

 यह प्रावधान भारतीय न्याय संहिता, 2023 से संबंधित है और इसमें यह स्पष्ट किया है कि अगर किसी व्यक्ति की सहमति किस स्थिति में वैध नहीं मानी जाएगी और किसमे नहीं।

1. डर या धोखे से ली गई सहमति – अगर कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को डरा कर या चोट के डर या फिर गलतफहमी के कारण सहमति लेता है, तो वह सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी।



2. मानसिक रोग या फिर नशे में दी गई सहमति – अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है या फिर किसी नशे में है और व्यक्ति को अपने फैसले का परिणाम समझ में ना आने के कारण उसने अपनी सहमति दे दी , तो ऐसे व्यक्ति की सहमति अमान्य होगी।



3. 12 साल से कम उम्र के बच्चे की सहमति – 12 साल से छोटे बच्चे की सहमति कानूनी रूप अमान्य होगी


सहमति तभी मान्य होगी जब वह व्यक्ति बिना किसके डर, धोखे, मानसिक रूप से ठीक हो और नाबलिक ना हो यानी 12 साल से कम उम्र का ना

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गैर-FASTag वाहनों पर दोगुना टोल लगाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को किया रद्द || high court judgement 2025|| Hight Court


बॉम्बे हाई कोर्ट ने बिना 'FASTag' दोहरा टोल शुल्क वसूली को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज की

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) को रद्द किया है, जिसमें NHAI के उन नियमो को चुनौती दी गई थी, जो कि बिना FASTag वाले वाहनों से डबल टोल लेने की अनुमति देता है।

मुख्य न्यायाधीश आलोक अर्दे और न्यायमूर्ति भारती डांगरे की खंडपीठ ने कहा कि FASTag सरकार की नीति के तहत शुरू किया गया था।, जिसका उद्देश्य सड़क यात्रा को अधिक सरल और प्रभावी बनाना है। अदालत ने कहा,

"आज के समय में, खासकर मुंबई और पुणे जैसे शहरों में, शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करता हो। जब लोग मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, तो वे उसकी रिचार्ज करना भी आता है। FASTag का उपयोग करना कोई कठिन काम नहीं है और इसे ऑफलाइन भी शुरू किया जा सकता है। ऐसे में इस नीति में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।"


याचिकाकर्ता की मांग और दलीलें


याचिकाकर्ता ने 12/02/2021 और 14/02/2021 को जारी किए गए NHAI के सर्कुलर को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें बिना FASTag वाले वाहनों से दोगुना टोल शुल्क वसूलने का प्रावधान किया गया था। उन्होंने कम से कम एक लेन को हाइब्रिड लेन रखने की भी मांग की थी, जिससे वाहन चालक नकद या अन्य माध्य से टोल शुल्क का भुगतान कर सकें।


याचिकाकर्ता का तर्क था कि कुछ लोग अभी भी डिजिटल तकनीक से अवगत नहीं हैं, और ऐसे लोगों के वाहनों की आने जाने में पाबंदी लगाना और उनसे दोगुना शुल्क लेना मनमानी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि FASTag न होने पर अधिक शुल्क लगाना, अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मिले 'स्वतंत्र रूप से आने-जाने' के अधिकार का उल्लंघन करना है।


कोर्ट द्वारा लिया गया निर्णय


कोर्ट ने कहा कि FASTag को 2014 में लाया गया था और इसे पूरे देश में स्टेप-बाय-स्टेप तरीके से लागू किया गया। इसे अनिवार्य करने से पहले जनता को इसे अपनाने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था। साथ ही, सरकार ने 2016 से 2020 तक FASTag उपयोगता को 10% से 2.5% तक का कैशबैक देकर इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी किया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि FASTag न होने पर लिया गया दोगुना रुपए 'दंड' (Penalty) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये दंड नहीं बल्कि NAHI द्वारा ली जाने वाली एक तरह की "फीस" है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियम, 2008 के नियम 6(3) के तहत वैध है।


संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है


कोर्ट ने यह भी कहा कि FASTag को अनिवार्य बनाना किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता। यह धारणा गलत है कि बिना FASTag वाले वाहनों को टोल प्लाजा पार करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। 14/02/2021 के सर्कुलर के अनुसार, ऐसे वाहन टोल प्लाजा पर ही POS (प्वाइंट ऑफ सेल) से FASTag प्राप्त कर सकते हैं, इसे चिपका सकते हैं और इसका उपयोग करना शुरू कर सकते हैं।


अदालत ने कहा, "हम यह नहीं मानते कि वाहन के आने जाने पर कोई रोक है, जैसा कि याचिकाकर्ता का दावा है। बल्कि, नकद भुगतान के स्थान पर FASTag के उपयोग को बढ़ावा देना के लिए यह आवश्यक है कि वाहन दोगुना शुल्क अदा करे।"


FASTag को अपनाने की आवश्यकता


अदालत ने यह भी कहा कि FASTag का उपयोग बहुत आसान है और इसे रिचार्ज करने के लिए UPI, ऑनलाइन बैंकिंग और अन्य एप्लिकेशन सहित बहुत से विकल्प हैं।


अदालत ने टिप्पणी की,

"यह कल्पना करना मुश्किल है कि भारत में जनता FASTag जैसी सरल तकनीक का उपयोग करने में असमर्थ होगी।"


निष्कर्ष


अदालत ने यह स्पष्ट किया कि नकद भुगतान को प्रतिबंधित करना कोई मनमानी वाला निर्णय नहीं है और न ही यह संविधान के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

इसके आधार पर, कोर्ट ने इस याचिका रद्द कर दिया।


मामले का वितरण:


मामला: अर्जुन राजू खानापुरे बनाम भारत संघ एवं अन्य (जनहित याचिका संख्या 75/2021)

सरकारी भर्ती परीक्षा में नकली दस्तावेज बनाने से असली उम्मीदवारों का नुकसान होता है: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने फर्जी सर्टिफिकेट की जांच के आदेश दिए।|| High court

 Title: SAHIL AND OTHERS v. STAFF SELECTION COMMISSION NORTH WESTERN REGION AND OTHERS

सरकारी नौकरियों में गड़बड़ी पर हाई कोर्ट सख्त।

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल करना को एक गंभीर अपराध माना है और इस दिशा पर सख्ती से रोक लगाने के आदेश दिए।

मुख्य बाते

1. सरकारी नौकरी में फर्जी प्रमाणपत्रों का उपयोग

6 अभ्यर्थियों ने फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र का उपयोग करके परीक्षा में अतिरिक्त सुविधाएं प्राप्त की जैसे अधिक समय और लेखक में दूसरे की मदद लेना


ये प्रमाणपत्र उत्तर प्रदेश और हरियाणा के विभिन्न जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के नाम पर जमा किए गए है जबकि, जबकि अभ्यर्थी उन जिलों के निवासी नहीं थे।

जांच में यह भी पाया गया कि ये प्रमाणपत्र असली नहीं थे।


2. कोर्ट का निर्णय


हाई कोर्ट ने इन 6 अभ्यर्थियों को 3 साल के लिए सरकारी नौकरियों से प्रतिबंधित कर दिया।

मामले की रिपोर्ट वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भेजने और इन अभ्यर्थियों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत कार्रवाई करने के आदेश दिए गए।

High court ने हरियाणा Vigilance Bureau को इस मामले की जांच करने का आदेश दिये है।


3. कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ


न्यायमूर्ति विनोद भारद्वाज ने कहा कि फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी नौकरियों प्राप्त करना कानून का गंभीर उल्लंघन है और ऐसा करने से ईमानदार अभ्यर्थियों की उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन होता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि फर्जी आरक्षण, खेल कोटा और अन्य लाभ लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे सख्ती से रोका जाना चाहिए।

जब जांच की बात हुई, तो याचिकाकर्ताओं के वकील ने याचिका वापस लेने की कोशिश की, जिससे कि साफ पता चलता है कि वे अपने दस्तावेजों की जालसाजी से अवगत है और कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं 


अंतिम निर्देश:


SSC (North West Region), चंडीगढ़ को सभी फर्जी दस्तावेजों के मामलों की रिपोर्ट SSP, चंडीगढ़ को देने का आदेश।


SSP, चंडीगढ़ और हरियाणा सतर्कता ब्यूरो को तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट कोर्ट में जमा करने का निर्देश।


निष्कर्ष:


यह फैसला सरकारी परीक्षाओं में धोखाधड़ी रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है

लुक-आउट सर्कुलर सख्त कदम है और इसके बुरे असर हो सकते हैं। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को इसे जारी करने से पहले अच्छी तरह सोचना चाहिए। High court। Hight court judgement 2025। High Court

 Case Title: BAGADI SANTOSH KUMAR v. UNION OF INDIA

Date of Judgment: 12.03.2025 

Case Number: WRIT PETITION NO: 4788/2025

यह मामला लुक-आउट सर्कुलर (LOC) जारी करने से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करता है और यह दर्शाता है कि यह एक कठिन उपाय है, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता और आने-जाने के अधिकारो को प्रभावित करता है

महत्वपूर्ण प्वाइंट 

1. LOC के प्रभाव:

LOC एक दंडात्मक कठिन उपाय है जो किसी व्यक्ति को सरेंडर करने के लिए मजबूर करता है और व्यक्तियो की निजी स्वतंत्रता व स्वतंत्र आने-जाने के अधिकार को भी प्रभावित करता है।


LOC जारी करने से पहले संबंधित प्राधिकरण को प्रत्येक मामले के तथ्यों पर उचित विचार करना चाहिए।


2. पूरे मामले की पृष्ठती करना:

याचिकाकर्ता बगाड़ी संतोष कुमार, जो कि कैपजेमिनी ऑस्ट्रेलिया में मैनेजर हैं, अपने ससुर के अंतिम संस्कार के लिए भारत आए हुए थे।

विशाखापट्टनम हवाई अड्डे पर उन्हें रोककर LOC की जानकारी दी गई।

याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले उनकी पूर्व पत्नी थम्मिनेनी ज्योत्स्ना रानी ने घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और धमकी के आरोप में केस दर्ज कराया था।

मामला आई एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, विशाखापट्टनम के समक्ष लंबित है, जिसमें याचिकाकर्ता जांच में सहयोग कर रहे है।

इसके बाद, याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की और उनकी पूर्व पत्नी इस मामले में एकतरफा अनुपस्थित रहीं।

तलाक के बाद, याचिकाकर्ता ने उ. स्वाति के साथ पुनर्विवाह कर लिया।


3. नई शिकायत और LOC का जारी होना

तलाक के बाद, पूर्व पत्नी ने 10.09.2024 को एक नई शिकायत दर्ज कराई, जिसे क्राइम नंबर 319/2024 (विशाखापट्टनम एयरपोर्ट पुलिस स्टेशन) के तहत दर्ज किया गया।

इस शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 और 85 के तहत आरोप लगाए गए।

इसके आधार पर विशाखापट्टनम के पुलिस अधीक्षक (5वें उत्तरदायी पक्षकार) ने LOC जारी करवा दी।

4. कोर्ट का फैसला:


जबकी याचिकाकर्ता ऑस्ट्रेलिया में थे, उन्हें LOC के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी।

पुलिस पहले ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी कर चुकी थी, और याचिकाकर्ता ने पुलिस की इस जांच में पुरा सहयोग भी दिया था।

इन तथ्यों को देखते हुए, कोर्ट ने LOC को अनावश्यक और अनुचित मानते हुए इसे रद्द करने का निर्देश दे दिया 


विशाखापट्टनम के पुलिस अधीक्षक को 17.09.2024 को जारी LOC वापस लेने के आदेश दिए गया।


निष्कर्ष:

यह फैसला LOC के अनुचित उपयोग के खिलाफ एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है, तो LOC जारी करना अनुचित है।


यह निर्णय स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह सुनिश्चित करता है कि LOC का उपयोग केवल अनिवार्य परिस्थितियों में ही किया जाए।